रविवार, 9 अगस्त 2015

यह समस्या मेरी है .




गिरिजा कुलश्रेष्ठ
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जीवन के पाँच दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।



एक जंगल से गुजरते हुए ,
लिपटे चले आए हैं ,
कितने ही मकड़जाल.
चुभ गए कुछ तिरछे नुकीले काँटे
धँसे हुए मांस-मज्जा तक .
टीसते रहते हैं अक्सर .
महसूस नही कर पाती ,
क्यारी में खिली मोगरा की कली को .
अब मुझे शिकायत नही कि,
तुम अनदेखा करते रहते हो यह सब .   
यह समस्या मेरी है कि ,
काँटों को निकाल फेंक नही सकी हूँ , 
अभी तक . 
कि सीखा नही मैंने
आसान सपाट राह पर चलना .

कि यह जानते हुए भी कि,
तन गईं हैं कितनी ही दीवारें
आसमान की छाती पर ,
मैं खड़ी हूँ आज भी
उसी तरह , उसी मोड़ पर
जहाँ से कभी देखा करती थी .
सूरज को उगते हुए .

कि ठीक उसी समय जबकि ,
सही वक्त होता है
अपनी बहुत सारी चोटों और पीड़ाओं के लिये  
‘तुम’ को पूरी तरह जिम्मेदार मानकर
तुम से ..इसलिये पीड़ा से भी 
छुटकारा पाने का.
और आश्वस्त करने का ‘मैं’ को ,
मैं अक्सर तुम्हारी की जगह आकर
विश्लेषण करने लगती हूँ ,
तुम' की उस मनोदशा के कारण का , 
उसके औचित्य-अनौचित्य का.
और ...
मैं' के सही-गलत होने का भी .
तब मुक्त कर देती हूँ ‘तुम’ को
हर अपराध से .
इस तरह हाशिये पर छोड़ा है  
एक अपराध-बोध के साथ सदा ‘मैं’ को
खुद मैंने ही .

विडम्बना यह नही कि
दूरियाँ सहना मेरी नियति है .
बल्कि यह कि आदत नही हो पाई मुझे
उन दूरियों की अभी तक .
जो है ,जिसे होना ही है
उसकी आदत न हो पाने से बड़ी सजा
और क्या हो सकती है .

पता नही क्यूँ ,
जबकि जरूरत नही है
उस पार जा कर बस गए लोगों को,
मेरा सारा ध्यान अटका रहता है
एक पुल बनाने में .
उनके पास जाने के लिये ,
जिनके बिना रहना
सीखा नही मैंने अब तक .
चली जा रही हूँ उन्ही के पीछे 
जो देखते नही एक बार भी मुड़कर .

यह मेरी ही समस्या है कि,
कि मुझे हवा के साथ चलना नही आता 
नहीं भाता , धारा के साथ बहना .
प्रायः बैर रहता है मगर से , 
जल में रहते हुए ही .

यह समस्या मेरी ही है
कि मैं खड़ी रहती हूँ
अक्सर बहुत सारे मलालों 
और सवालों के घेरे में 
खुद ही .  

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