लम्हों से जो एक लम्हा रह जाता है हथेलियों में उलझकर उनको सुलझाकर लिखना आसान नहीं …
रविवार, 21 अगस्त 2016
सोमवार, 21 सितंबर 2015
देवदार पे बैठी सफ़ेद चिड़िया
![[283013_253257488017833_100000007514202_1090934_7578753_n.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj0EAyTUWkLX8JUd2qaHqyurWgJaTgLC5Fe5EkmgWNUYtTfcTD5MHm1_lT9dIo8dpgcUQZ3-PTNl5J-2dxfebw5rc49SCQPRKY_1nWW54K9ZTkH21qOb6aVs19unywl6v8R0snHTHu2qXBQ/s151/283013_253257488017833_100000007514202_1090934_7578753_n.jpg)
मुकेश पांडे
http://mukeshpandey87.blogspot.in/
मैं तुम्हें सोचता हूँ और सफ़ेद हो जाता हूँ,
जैसे किसी देवदार पे बैठी
सफ़ेद चिड़िया एकटक आकाश ताकती रही
और अब इत्मीनान से एक धवल उड़ान भरती है।
जैसे किसी मादक देह की महक से
दूर तक खिल रही हों वादियां,
या किसी बीचों-बीच पत्थर पर
वे श्वेत वस्त्र पवित्र कर देते हों तमाम झरने।
सुनो मैं दूर निकल आया हूँ, बहुत दूर...
यहाँ इस सफ़ेद झील के किनारे
एक दूधिया वृक्ष के ठीक ऊपर
कुछ उजले तारों के छींटे पड़ें हैं,
वहां उस तरफ झील में एक सफ़ेद नाव पर दो प्रेमी बैठे हैं,
कुछ स्वर फूट रहे हैं, कुछ धुनें बह रही है
वो खिलखिलाहट, वो सफेदी चांदनी में घुल रही है
और चाँद अब सफ़ेद हो रहा है..
मैंने अक्सर महसूस किया है कि यदि
प्रेम में साफगोई हो तो वह सफ़ेद हो जाता है।
और देखो
अब एक सफ़ेद साफ़ हवा मुझे घेरे हुए है
जैसे कोई बेदाग़ सी चादर मुझ पे लपेटे हुए है।
ये मीठी बूंदों की रात रानी मेरी देह पर झर रही है,
मेरे होंठों के सेकों से धौलाधार पिघल रहे हैं।
धीरे-धीरे सभी घाव भर रहे हैं
एक नींद बन आई है।
अनंत निर्वात पर चौंधियाता सफेद भर गया है,
हर तरफ से यहाँ अब धुंध घिर आई है
गाढ़ी सफ़ेद...
आह!
"शांति" अगर कहीं प्रत्यक्ष रूप से देखी गयी होगी
तो वह किसी कोमल सीप में रखा उज्जवल मोती रहा होगा,
जिसे कुछ कहना नहीं होता बस उस गर्भ में रहना होता है।
प्रेमी एक असली बैरागी होता है,
प्रेमिका एक माँ जिसे उसकी प्रगाढ़ता में उसे पढ़ना होता है।
और सुकून.....
यह एक सूखा हुआ पत्ता है
जिसे वृक्ष से झर कर उसके कमलों में रहना है।
यह एक झरा हुआ पंख है
जो आकाश से उतरा है और मेरी हथेली पे ठहरा है।
सुनो मैं दूर निकल आया हूँ, बहुत दूर..
यहाँ हर तरफ प्रार्थनाएं हैं
और शब्दों ने अपने हिस्से का प्रकाश खोज लिया है,
यहाँ दूर तक उजाला फैला हुआ है.
सफ़ेद...
यहाँ एक श्वेत वस्त्रधारी ब्राह्मणी गुलबहार चुन रही है,
और उस देवदार पर वो सफ़ेद चिड़िया आकाश ताक रही है..
सुनो मैंने महसूस किया है कि
सफ़ेद इन्द्रधनुष का एक ज़रूरी रंग होगा।
गुरुवार, 10 सितंबर 2015
चाहत जीने की
दिगम्बर नासवा
स्वप्न स्वप्न स्वप्न, सपनो के बिना भी कोई जीवन है ...
बेतरतीब लम्हों की चुभन मजा देती है ... महीन कांटें अन्दर तक गढ़े हों तो उनका मीठा मीठा दर्द भी मजा देने लगता है ... एहसास शब्दों के अर्थ बदलते हैं या शब्द ले जाते हैं गहरे तक पर प्रेम हो तो जैसे सब कुछ माया ... फूटे हैं कुछ लम्हों के बीज अभी अभी ...
टूट तो गया था कभी का
पर जागना नहीं चाहता तिलिस्मी ख्वाब से
गहरे दर्द के बाद मिलने वाले सकून का वक़्त अभी आया नही था
लम्हों के जुगनू बेरहमी से मसल दिए
कि आवारा रात की हवस में उतर आती है तू
बिस्तर की सलवटों में जैसे बदनाम शायर की नज़्म
नहीं चाहता बेचैन कर देने वाले अलफ़ाज़
मजबूर कर देते हैं जो जंगली गुलाब को खिलने पर
महसूस कर सकूं बासी यादों की चुभन
चल रहा हूँ नंगे पाँव गुजरी हुयी उम्र की पगडण्डी पे
तुम और मैं ... बस दो किरदार
वापसी के इस रोलर कोस्टर पर फुर्सत के तमाम लम्हों के साथ
धुंए के साथ फेफड़ों में जबरन घुसने की जंग में
सिगरेट नहीं अब साँसें पीने लगा हूँ
खून का उबाल नशे की किक से बाहर नहीं आने दे रहा
काश कहीं से उधार मिल सके साँसें
बहुत देर तक जीना चाहता हूँ जंगली गुलाब की यादों में
टूट तो गया था कभी का
पर जागना नहीं चाहता तिलिस्मी ख्वाब से
गहरे दर्द के बाद मिलने वाले सकून का वक़्त अभी आया नही था
लम्हों के जुगनू बेरहमी से मसल दिए
कि आवारा रात की हवस में उतर आती है तू
बिस्तर की सलवटों में जैसे बदनाम शायर की नज़्म
नहीं चाहता बेचैन कर देने वाले अलफ़ाज़
मजबूर कर देते हैं जो जंगली गुलाब को खिलने पर
महसूस कर सकूं बासी यादों की चुभन
चल रहा हूँ नंगे पाँव गुजरी हुयी उम्र की पगडण्डी पे
तुम और मैं ... बस दो किरदार
वापसी के इस रोलर कोस्टर पर फुर्सत के तमाम लम्हों के साथ
धुंए के साथ फेफड़ों में जबरन घुसने की जंग में
सिगरेट नहीं अब साँसें पीने लगा हूँ
खून का उबाल नशे की किक से बाहर नहीं आने दे रहा
काश कहीं से उधार मिल सके साँसें
बहुत देर तक जीना चाहता हूँ जंगली गुलाब की यादों में
शुक्रवार, 4 सितंबर 2015
असफल प्रेम के बाद
अंजू शर्मा
जेहन में घुली नीम सी कड़वाहटें
वजूद में बढ़ती उदासियों की गलबहियां
अवसाद से शामों की बढ़ती मुलाकातें
ये तय करना मुश्किल है पहले कौन मरता है
प्रेम या सपने
प्रेम की दुनिया में पहले कदम और
जीवन में बसंत की आमद
का हर बार समानार्थी होना
जरूरी तो नहीं
वैवाहिक जीवन का
अगर होता कोई गेट पास
तो अनुभवों का माइक्रोस्कोप भी नहीं ढूंढ
सकता इस पर गारंटी या वारंटी
यह हर बार मुमकिन नहीं
कि मधुमास सदा घोल दे जीवन में
मधु भरे लम्हों का स्वाद
रिस जाता है मधु कलश
कभी कभी मास बीतने से ठीक पहले
प्रेम बदलता है समझौतों
की अंतहीन फेहरिस्त में
उम्मीदें लगा लेती हैं
छलावे का मुखौटा
सपने उस ट्रेन से हो जाते हैं
जो रेंगती है अनिश्चितता की पटरी पर
ढोते हुये तमाम डर और शंकाएँ
और नज़रों के ठीक सामने होते हैं
लौटने के तमाम धूमिल होते रास्ते
इस सफर में हर रात थोड़ा थोड़ा
पिघलती है मोम बनकर एक औरत
चुप्पी की कायनात से बाहर एक-एक कदम बढ़ाती
वह एक दिन झड़का देती है आत्मा से चिपकी बेबसी और लाचारी
आईने में खुद को चीन्हती
एक दिन उतार फेंकती है
स्वांग का लबादा
अपने भीतर से उगल देती है सारी आग
कि उसके हवाले कर सके उस ढेर को
जिन्हे कभी प्रेमपत्र कहा था
ठोकर पर रखती है कायनात
अपनी सालों पुरानी तस्वीर से बोलती है
"गुड मॉर्निंग"
तलाशती है अपने नाम का एक उगता सूरज
थामती है एक बड़ा सा कॉफी मग
और जहां खत्म हो जाना था दुनिया को
वही से शुरू होता है एक औरत का
अपना संसार ............
रविवार, 23 अगस्त 2015
तुम्हारे होने का मतलब
नीरज पाल
रचना मेरे लिए एक महत्व रखती है...और रचना सही मायने में रचना नहीं बल्कि क्षणिक आवेगों और संवेदनाओं का बहाव होता है. इसलिए अनुरोध है कि इसे मेरा व्यक्तित्व न समझें.
तुम्हारे होने का मतलब.......
ठीक वैसा ही है,
जैसे कड़कती ठंढ में अलाव की आंच.
(कुछ होने जैसा और बहुत कुछ ना होने जैसा, यह कुछ वैस ही है जैसे एक बड़े शहर के स्काइलाइन के ठीक ऊपर खड़े होकर चमकती रोशनियों के पार, फैली झील के ऊपर लिपटी धुंध, और जहाँ अँधेरा होने के बावजूद, चमकती चांदनी में शफ्फाक धुंध का सफ़ेद होकर चमक जाना)
तुम्हारे होने का मतलब,
यह भी है,
कि खिली गुलदाउदी में पड़ी ओस का मोतियों सा चमक जाना,
(कुछ ऐसा भी जैसे उस फोटोग्राफर को बेस्ट फोटोग्राफर का अवार्ड मिलना सबसे सुन्दर फोटो खींचने पर, उस फोटो पर जिसमे उसने गर्द से भरी दिल्ली की भोर में प्रदुषण के गुब्बारों को कैद किया था, लेकिन वहीँ बगल के कृत्रिम झील मं छोड़ आया था, दूर देश से उड़ आये उस सैलानी साइबेरियाई पक्षी को, जो कैद हो जाना चाहता था उसके काले लेंसों में हमेशा के लिए)
तुम्हारे होने का मतलब,
यह कतई नहीं कि प्रेम अपने उफान पर है,
बल्कि ऐसा जैसे प्रेम का अंकुरित हो जाना,
उस बंजर धरती पर,
जहाँ सालों पानी की एक बूँद भी नहीं ठहर पायी थी.
(गाँव के बाहर की वह जमीन सालों से उजाड़ पड़ी थी, सुना था की वहां पहले एक तालाब हुआ करता था, जिसे जमीन बढाने की लालच में लोगों ने भर दिया था, और फिर वहां नहीं उगा कुछ भी, नहीं टिका कुछ भी, और पानी की बूँद पड़ते ही झक्क से भाप बनकर उड़ जाया करती थी, सालों से शायद उसे था मेरे ही प्रेम का इंतज़ार, पता है आज वहां पारिजात खिला था.)
तुम्हारे होने का मतलब,
खुशबु का फ़ैल जाना बिलकुल नहीं हो सकता,
बल्कि वह कुछ ऐसा है जैसे,
फूटपाथ पर पड़ी उस बच्ची की मुस्कान,
जिसे आज ही ठंढ से बचने के लिए,
दो जोड़ी जूते और एक कम्बल मिलें हों.
तुम्हारे होने के कई मतलब हैं, लेकिन तुम्हारा ना होना वैसा ही जैसा, अरावली की वह कातर ध्वनि, जिसे अब कोई नहीं सुनना चाहता, बस रौंद रही हैं काली सडकें, और गुम्म होता शांत कलरव, अरावली अब भी खड़ा है, प्रेम के इंतज़ार में, क्या उसे मिलेगा वह प्रेम, उस बच्ची की तरह, गाँव के बाहर की उस बंजर जमीन की तरह, और झील के ऊपर उतर आई उस ओस की तरह, या फिर खुद को चिढाती उस फोटोग्राफ की तरह. शायद उसको मेरी तरह तुम्हारे होने जैसा कोई अभी नहीं मिला है.
शनिवार, 15 अगस्त 2015
द लास्ट टच
केतन कन्नौजिया
यूँ ही आवारगी में अल्फाज़ों को तरतीब देने की कवायद रहती है… कभी गाहे बगाहे कामयाबी मिल जाए तो ठीक, वरना अक्सर नाकाम लौटना होता हैं… ये ब्लॉग शायद गवाह है ऐसी ही आवारगी का… फिलहाल, इक तफ़तीश जारी है खुद की… गम-ए-ज़िंदगी… गम-ए-रोज़गार के चलते मसरूफ़ियत आ जाती है कभी कभार… मगर तलाश मसल्सल है साहब… देखिये कब पूरी होती है.
पेशे का ढंग से पता नहीं अलबत्ता गैरपेशेवर तरीके से एक इंसान बनने की कोशिश है… कब तक बन पाएँ, पता नहीं… दिल से शाइर और दमाग से अनाड़ी… कब, कहाँ, क्या इस्तेमाल करना है, अभी तक नहीं समझ आया… आज भी रिश्तों की फेरहिस्त में दोस्ती की एहमियत बहुत ज़्यादा है.
वक्त रुक जाता गर तो समेट लाते वो लम्हे,
उन शामों में नुक्कड़ पर जो बिखेरे थे कभी !!
हर बीतते लम्हे के साथ बाहर गिरती ओस अपने में जज़्ब हरारत को फ़ना कर रही थी… दिसम्बर 25 की उस रात घड़ी 3 बजकर 18 मिनट दिखा रही थी.
“कितने बजे निकालना है तुमको?”
“सुबह 8 बजे की फ्लाइट है… टी-3 से.”
“पैकिंग पूरी हो गयी? टिकट रख लिया?”
“हम्म! आज रात कुछ तेज़ नहीं बीत रही?”
“जब लम्हे काबू में नहीं होते तो वक़्त पर किसी का बस नहीं रहता… वक़्त यूं ही फिसलता है रेत की तरह. खैर! कोशिश करना के हमेशा यूं ही मुसकुराती रहो”
“यूं ही?”
“हम्म!”
“शायद मुश्किल होगा… मगर कोशिश करूंगी. तुम आओगे शादी में?”
“हाहाहा… क्यों, अनिरूद्ध नहीं आ रहा क्या?”
“हम्म! समझ गयी. मुझे पता था वैसे के जवाब क्या होगा. खैर, तुम अपना खयाल रखना. प्लीज़ जल्दी शादी कर लेना. आई वुड बी रिलीव्ड. तुमको पता है ना, आई स्टिल…”
“हम्म!”
वो लम्हा उसके बाद एक लम्स में जज़्ब होता चला गया… एक लम्बा तवील लम्स. उस एक जोड़ी लब के अलावा शायद उस लम्हे की गवाह उस सर्द रात की खामोशी भी थी जो चाहकर भी कुछ नहीं कह पा रही थी. वो लम्हा… जिसके दूसरी ओर रवायतों में गुम होने वाली दो ज़िंदगियों को अपना-अपना हिस्सा जीना था, बिना एक दूसरे के सहारे के.
कुछ रिश्तों को शायद अपनी मुकम्मल उम्र जीने के लिए ऐसे आखिरी लम्स की ज़रूरत होती है… द लास्ट टच. ये लम्स शायद उस अलाव का काम करता है जिसमें बीते हुए कल का सब कुछ जलकर धुआँ हो जाता है, सिर्फ कुछ यादों की खाक बाकी रहती है… जिसमें से अपना अपना हिस्सा लेकर दोनों जिस्म अलग होते हैं. अंग्रेज़ी में कुछ लोग इसे “क्लोज़र” भी कहते हैं… इसके परे दोनों ज़िंदगियाँ आज़ाद होती हैं… मुक्त… इंडिपेंडेंट!
नज़्म जब अपनी बात कहती है
ना दिन शुरू होता है
ना रात ख़त्म होती है
बस जिस्म सुलगता है और
रूह पिघलती है
दर्द रिसता है और सांस सरकती है
ना ज़मीं मिलती है… ना फ़लक़ दिखती है
इक दूर… अँधेरे में कोई
नज़्म जब अपनी बात कहती है
बुधवार, 12 अगस्त 2015
मैं महानगर बनता जा रहा हूँ...
डॉ रवि शर्मा
![[11.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiWZwg6JTHO25azl_liUfCcNzi193uFv9xvOrw0YRqKRHNJSy8VNiNNyKjpjz8OoMq4v4hJutBP-oO-icUSShRyWlYaxvUjwE4BmZtCAEgJvDwOPsekEBr6nOMsq6tjYQZarqnpW7TTuJwU/s113/11.jpg)
'कुछ तो तेरे प्यार के मौसम ही मुझे रास कम आए, और कुछ मेरी मिट्टी में बगावत भी बहुत थी'. बस यही है मेरी फितरत. कुछ ही लोग मेरे दिल और दिमाग तक पहुँच पाते हैं. वैसे तो किसी शायर ने कहा है कि 'परखना मत, परखने से कोई अपना नहीं रहता', लेकिन मेरी आदत है छोटी छोटी बातें पकड़ना और उनका विश्लेषण करते रहना. और बगावती मिट्टी से पैदा हुई सोच का ही नतीजा है कि डाक्टरी की प्रेक्टिस छोड़कर पत्रकार बन गया...!!! रास तो खैर यह भी नहीं आ रहा.
मैं महानगर बनता जा रहा हूँ
और इसका अहसास भी
हुआ मुझे उसी रोज़
जब मैंने पाया
खुद को
हर दिशा से आई परेशानियों से घिरे हुए जो
मुझमे घर बनाने को आतुर थी।
तब मैंने जाना
इन परेशानियों के चेहरे
जाने पहचाने तो हैं
परिचित नहीं।
तभी मुझे लगा
मैं महानगर बनता जा रहा हूँ।
फ़िर उस रोज़
मेरे दिमाग के बीचोंबीच
एक चौराहे पर विचारों का
ट्रेफिक जाम हो गया।
पीछे कहीं फंस गयी यादों की चिल्लपों
के बाद मैं थम गया, लाल बत्ती सा।
तब मुझे लगा मैं महानगर बनता जा रहा हूँ।
और अभी कल ही तो
मेरे सीने से होकर गुजर रही
एक याद
वक्त की ताव न सहकर
गिर पड़ी
गश खाकर।
लोगों का हुजूम उसके चेहरे पर झुका,
मर गयी!
"अरे आगे बढो, देर हो रही है"
किसी विचार ने कहा।
और तभी मुझे लगा मैं महानगर बनता जा रहा हूँ।
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